मजलिस के पदाधिकारी पर हमला, टूटी चुप्पी नहीं – अब मुस्लिम युवाओं को सबक लेना चाहिए


बुलढाणा ज़िले में मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के ज़िला पदाधिकारी पर हुआ कायराना हमला और पार्टी के झंडों को तोड़ा जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि मुस्लिम समाज की आवाज़ को दबाने की एक सोची-समझी कोशिश है। इससे भी ज़्यादा शर्मनाक बात यह है कि इस पूरे मामले में पार्टी नेतृत्व की खामोशी आज देशभर में सवाल बनकर खड़ी है।
जिस पार्टी को पूरे हिंदुस्तान में मुसलमानों की जमात की रहनुमा बताया जाता है, वही पार्टी आज अपने ही पदाधिकारी पर हुए हमले पर चुप क्यों है?
ज़िला अध्यक्ष और पार्टी के वरिष्ठ नेता आखिर किस डर या मजबूरी में खामोश हैं?
यह सवाल आज सिर्फ़ बुलढाणा में नहीं, बल्कि हर उस मुसलमान की ज़ुबान पर है जो इंसाफ़ और सुरक्षा की उम्मीद रखता है।
अगर पार्टी के पदाधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम मुसलमान का क्या हाल होगा—यह सोचकर ही रूह काँप जाती है। यह घटना साफ़ बताती है कि ज़मीन पर मेहनत करने वाले कार्यकर्ता असहाय हैं और नेतृत्व उनसे मुँह मोड़े बैठा है।
अब मुस्लिम समाज के युवाओं को सबक लेना चाहिए।
भावनाओं में बहकर नहीं, बल्कि हक़ीक़त को देखकर फैसला करना होगा।
जो पार्टी अपने पदाधिकारी की नहीं हो सकती, वो आपकी क्या होगी?
आज जनता के बीच यही बात ज़ोरदार चर्चा का विषय बनी हुई है।
युवाओं को समझना होगा कि सिर्फ़ बड़े-बड़े दावे, जोशीले भाषण और भावनात्मक नारे काफी नहीं होते। जिस पार्टी में अपने ही लोगों के लिए आवाज़ उठाने का हौसला नहीं, वो समाज को क्या देगा?
आज ज़रूरत है सवाल पूछने की, जवाब माँगने की और खामोशी को चुनौती देने की।
क्योंकि जो पार्टी अपने सिपाहियों के साथ खड़ी नहीं होती, इतिहास गवाह है—वक़्त आने पर जनता भी उसके साथ नहीं खड़ी होती।
अब भी वक्त है—खामोशी तोड़ी जाए, दोषियों पर सख़्त कार्रवाई की माँग उठे और कार्यकर्ताओं को भरोसा दिया जाए।
वरना यह चुप्पी सिर्फ़ एक पार्टी नहीं, बल्कि पूरी जमात को नुकसान पहुँचाएगी।

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