मोहीसिन शेख, अखलाक, पहलू खान, रोहित वेमुला, डॉ. पायल तडवी, तबरेज़ अंसारी, सुलेमान खान…
ये सिर्फ़ नाम नहीं, हमारे ज़मीर पर लगे ज़ख़्म हैं।
हम सब जानते हैं इन मौतों का असली गुनहगार कौन है।
ये सिर्फ़ भीड़ की हिंसा नहीं थी, ये सियासी मौन और प्रशासनिक मिलीभगत का नतीजा है।
असली कातिल सिर्फ़ वो हाथ नहीं जो लाठियाँ और हथियार उठाते हैं, बल्कि वो कुर्सियों पर बैठे लोग भी हैं जो इन घटनाओं को चुनावी फायदे और नफ़रत की राजनीति के लिए इस्तेमाल करते हैं।
और वो भी जो इन मौतों का डर दिखाकर, खुद को सेक्युलर कहकर, हमारे वोट बटोरते हैं —
आओ भाऊ! कभी सड़कों पर भी उतरो, सिर्फ़ भाषणों और पोस्टरों में नहीं।
लेकिन अफसोस…
आज आऊ भाऊ के गुलामों में इतनी ताक़त नहीं बची कि जिन आऊ भाऊ के नाम पर उन्होंने पूरी ज़िंदगी दी, कम से कम उन्हें तहसील तक एक निवेदन देने ले जा सकें।
ये आऊ भाऊ के गुलाम कौन-सा इस्लाम लेकर चल रहे हैं?
इस्लाम तो वो है जिसमें नफ़ा और नुकसान का मालिक सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरा अल्लाह है।
तो फिर इनको कौन-सा नफ़ा और कौन-सा नुकसान आऊ भाऊ के पास दिख रहा है?
क्या आऊ भाऊ इनके लिए अल्लाह से भी बड़ा हो गया है?
अब डरने का नहीं, लड़ने का वक़्त है।
हमारी चुप्पी ही इन कातिलों की सबसे बड़ी ताक़त है।
अगर हम हर लाश को सिर्फ़ एक और आंकड़ा मानकर भूलते रहे, तो अगली बारी शायद हमारी होगी।
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नांदुरा