✍️ लेखक: आज़ाद पठान, युवा ज़िलाध्यक्ष – समाजवादी पार्टी📢 "मुस्लिम वोटों का इस्तेमाल, लेकिन प्रतिनिधित्व का अभाव?"



7 जुलाई को मलकापुर तहसील कार्यालय में “उदयपुर फाइल” फ़िल्म के विरोध में जो ज्ञापन दिया गया, उसमें एक बात साफ़ दिखी — पूरे फोटो में और सूची में सिर्फ मुस्लिम समाज के कार्यकर्ताओं और नागरिकों के नाम और चेहरे नजर आ रहे हैं।
लेकिन सवाल ये उठता है कि —
वो नेता कहाँ हैं जो मुस्लिम समाज के वोटों से नगरसेवक, नगराध्यक्ष, विधायक और सांसद बने?
इन्हीं मुस्लिम बस्तियों से वोट लेकर सत्ता की कुर्सियाँ पाने वाले ये नेता आज समाज की भावनाओं और सम्मान की लड़ाई में नदारद क्यों हैं?

📌 ये सिर्फ एक ज्ञापन नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वासघात है!

“उदयपुर फाइल” फ़िल्म में मुस्लिम धर्म की आस्था और भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले दृश्य दिखाए गए हैं। इस पर प्रतिबंध लगाने की माँग पूरी तरह जायज़ है।
मुस्लिम समाज अपने हक़ की आवाज़ उठा रहा है – लेकिन जिनका असली कर्तव्य था साथ खड़ा होना, वही नेता मौन हैं, गायब हैं।

> क्या मुस्लिम समाज सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गया है? क्या इन नेताओं को समाज की भावनाएँ सिर्फ चुनाव के वक्त याद आती हैं?

🛑 अब ये दोहरा राजनीतिक चरित्र बंद होना चाहिए!

चुनावों के समय मुस्लिम बस्तियों में दरवाजे-दरवाजे जाकर हाथ जोड़ने वाले नेता आज ग़ायब हैं।

मुस्लिम समाज जब सार्वजनिक तौर पर विरोध करता है, तो उनके तथाकथित “प्रतिनिधि” साथ खड़े होने से कतराते हैं।

📣 समाजवादी पार्टी का स्पष्ट संदेश:

समाजवादी पार्टी हमेशा से सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और समान भागीदारी की वकालत करती रही है। हमारी माँग है:

1. मुस्लिम समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली फिल्मों पर तुरंत रोक लगाई जाए।

2. धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाने वाले कंटेंट पर सख्त क़ानूनी कार्यवाही हो।

3. मुस्लिम समाज को सिर्फ वोट देने वाला नहीं, बल्कि नीति निर्धारण में भागीदार के रूप में स्वीकार किया जाए।

आज सवाल मुस्लिम समाज से नहीं, बल्कि उन नेताओं से पूछा जाना चाहिए –
जो समाज के वोटों पर सत्ता में हैं, लेकिन संघर्ष के समय नज़र नहीं आते।

✊ मुस्लिम समाज सिर्फ वोटिंग मशीन नहीं है – वो जागरूक, स्वाभिमानी और संघर्षशील है!
– आज़ाद पठान
युवा ज़िलाध्यक्ष
समाजवादी पार्टी – नांदुरा

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