🗓 दिनांक: 20 जुलाई 2025
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20 जुलाई को नंदुरा की सरज़मीन पर आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की जानिब से एक बड़ी सभा रखी गई। मशहूर सांसद सैयद इम्तियाज़ जलील साहब को बुलाया गया। प्रचार इतना ज़ोरदार था कि नंदुरा की हर गली, हर दीवार, हर नुक्कड़ से यही सदा आ रही थी —
"आइए, आपके मसले उठाए जाएंगे।"
और हमारी ग़य्यूर अवाम — मोहब्बत, भरोसा और उम्मीद लेकर वहां पहुंची।
उम्मीद थी कि बात होगी:
- मोहल्लों की बदहाल सड़कों की,
- बच्चों की तालीम की,
- नौजवानों के रोज़गार की,
- और हमारे बुनियादी हक़ की।
मगर अफ़सोस — वहां सिर्फ़ सियासत हुई, मुद्दे गायब रहे।
क्यों?
क्योंकि नंदुरा के कुछ ज़िम्मेदारों ने न तो सही समय पर जलील साहब को मंच तक पहुँचने दिया,
न ही हक़ीक़त उन तक पहुँची।
जनता के भरोसे के साथ धोखा किया गया।
और ये पहली बार नहीं है...
आज फिर हाजी मस्तान साहब की बात याद आती है:
"लाउडस्पीकर की आवाज़ सुनकर अमीर नहीं आता,
भीड़ हमेशा ग़रीब लगाता है — ये सोचकर कि आज उसके हक़ की बात होगी।"
मगर फिर वही हुआ —
वो आए, बोले, और चले गए...
हम — फिर चिल्लाते रह गए।
हमारे हिस्से आई सिर्फ़ मायूसी।
"हर किताब की किस्मत में लाइब्रेरी नहीं होती,
कुछ किताबें कबाड़ी की दुकान में भी मिलती हैं...
हम — शायद उन्हीं किताबों में से हैं।"
अब वक़्त है कि नंदुरा की अवाम जागे —
अब सिर्फ़ जज़्बात नहीं, समझदारी से फैसला हो।
अब सवाल ये है —
हम किसके साथ खड़े हैं... और क्यों?
अपने बच्चों के मुस्तकबिल के लिए,
अपने मोहल्लों की तरक्की के लिए,
और अपने हक़ की आवाज़ बुलंद करने के लिए —
अब अगर नहीं जागे, तो फिर कब?
✍️
अब्दुल रफ़ीक़ शेख
(RTI एक्टिविस्ट)
"अवाम की आवाज़"
अगर आप चाहें तो इसका मराठी अथवा उर्दू संस्करण भी तैयार कर सकता हूँ।