मलकापुर की राजनीति में नई युति या नई सच्चाई?मलकापुर शहर की राजनीति ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आज की राजनीति में विचारधारा नहीं, बल्कि सत्ता सर्वोपरि हो चुकी है।


जिस राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का अजीत दादा पवार गुट आज खुले तौर पर भारतीय जनता पार्टी का घटक दल है, उसी गुट को नगरसेवक पद के को-ऑप्शन के लिए मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने समर्थन दिया।
यह सवाल अब आम नागरिक पूछ रहा है —
जिस मजलिस ने हमेशा खुद को भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ बताया, वही मजलिस भाजपा-घटक दल के साथ कैसे खड़ी हो गई?
वोट की राजनीति और सत्ता का गणित
मजलिस चुनाव के समय अल्पसंख्यक समाज की भावनाओं, अस्मिता और गंभीर मुद्दों को सामने रखकर वोट मांगती है।
भाषणों में तीखापन, मंचों पर आक्रामकता और सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।
लेकिन सत्ता का मौका आते ही वही मजलिस राष्ट्रवादी अजीत दादा पवार गुट जैसे भाजपा-समर्थित दल के साथ युति करती नजर आती है।
तो फिर जनता के सामने उठता है सवाल —
क्या यह युति सिद्धांतों पर आधारित है, या फिर कुर्सी और पद के लिए किया गया समझौता?
जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़
जिस मतदाता ने मजलिस को यह सोचकर वोट दिया कि वह भाजपा और उसके सहयोगी दलों की राजनीति का विकल्प बनेगी,
आज वही मतदाता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
क्योंकि ज़मीन पर सच्चाई यह है कि
चुनाव में विरोध, सत्ता में समझौता — यही आज की राजनीति का कड़वा सच बन गया है।
इस युति को क्या कहा जाए?
राजनीतिक विश्लेषकों और आम नागरिकों की भाषा में यह गठबंधन कहा जा सकता है:
सत्ता-स्वार्थी युति
अवसरवादी गठबंधन
पर्दे के पीछे की राजनीतिक डील
विचारधारा विरोधी आघाड़ी
लेकिन सबसे सटीक नाम शायद यही है:
“यह न उसूलों की युति है, न सिद्धांतों की — यह सिर्फ और सिर्फ कुर्सी की युति है।”
मलकापुर की जनता सब देख रही है
मलकापुर की जनता अब पहले जैसी भोली नहीं रही।
कौन चुनाव के समय क्या बोलता है और सत्ता के समय किसके साथ खड़ा होता है — यह सब जनता बारीकी से देख रही है।
आज नहीं तो कल,
इस राजनीति का जवाब जनता अपने वोट से ज़रूर देगी।

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